“ उस क्षितिज की ओर............ ”

“ उस क्षितिज की ओर............ ”

मेरे मन की वेदना
कुछ तीव्र जो हो
गयी हो तुम
मेरे मन की चेतना
कुछ मन्द-मन्द जो हो
गयी हो तुम
तीव्र होकर मुझे
उस क्षोर तक
ले चलो तुम
उस क्षितिज
से भी आगे
जिसकी कोई
सीमा न हो
जिसमे कोई
बन्धन न हो
जिसका कोई
अन्त न हो
उस अन्त
से भी आगे
ले चलो तुम
जहाँ इतनी
ऊंचाई हो
उस आकाश
से भी ऊँचा
मन की वेदना
को चीरता हुआ
उस क्षितिज की ओर
जहाँ पर
एक सागर हो
जो मेरे मन की
वेदनाओ को
बुझा सके
और उस सागर
से भी आगे
हो एक क्षितिज
जहाँ हो एक
ज्योति पुंज
जो मेरे मन की
चेतनाओ को
जला सके
और मेरे
मन की चेतना
कुछ मन्द-मन्द
जो हो गयी
हो तुम
उन्हें तीव्र
कर सके
इसलिए हे मेरे मन
तुझे चलना होगा
उस क्षितिज की ओर.........


अलका सिंह