“ परम्परायें ”
नियमो से रची
होती है ये
परम्परायें
पैरों में बेडियो
सी पड़ी होती
है ये परम्परायें
जीवन की बहती
धारा में पत्थर
सी पड़ी होती
है ये परम्परायें
दादी नानी की
कहानी सी लगती
है ये परम्परायें
बचपन ये सुनी
ओर बुढ़ापे में
सुनायी जाती
है ये परम्परायें
मैं मिटा देना
चाहती हूँ अस्तित्व
इन परम्पराओ का
और भरना
चाहती हूँ
एक ऊँची उड़ान
लेकिन समाज के
अस्तित्व से जुडी
होती है ये परम्परायें
अलका सिंह